सोमवार, 18 अप्रैल 2011

मैंने देखा था कल शाम.....

मैंने देखा था कल शाम तुझे फिर से रोते हुए...
अपने गहरे ज़ख्मों को फिर नमक के पानी से धोते हुए...!

क्या लगता है के मैं कुछ नहीं जनता...
तेरे मासूम चेहरे पर बनी इन लकीरों को नहीं पहचानता...!

तेरी छाती से उतरे दूध को पिया है मैंने...
हर पल जब तू मरी वो हर पल तेरे साथ जिया है मैंने...!

यहाँ खड़ा हूँ इस चलते तूफ़ान के बीच...
तुने ही तो कहा था की इन पौधों को लहू से सींच...!

फिर भी पता नहीं के क्या मैं कर पाउँगा...
बस येही मालूम है की बेटा हूँ तेरा और यहीं मर जाऊंगा...!

मेरी भी तो माँ ने ही भेजा है मुझको तिलक लगा कर...
जाते हुए को बोली थी वापिस मत आना यहाँ पीठ दिखाकर...!

हाँ मैं देख रहा हूँ की वो बढे आ रहे हैं...
उनकी रफ़्तार ही ऐसी है की मेरे नाते सब बिछड़ते जा रहे हैं...!

अच्छा माँ देख मुझे अब फ़र्ज़ बुला रहा है...
खून का यह कैसा दौरा है उबलता ही जा रहा है...!

तेरी आँखों के आंसू तो शायद मैं न पोंछ सकूँगा...
लेकिन आज अगर मैं नहीं कट्टा तो अपने घर भी तो नहीं जा सकूँगा...!

माँ बस मेरी माँ से कहना की तेरा बेटा लौटा नहीं...
अब भी सरहद पे ही पड़ा है बुलाती हूँ तो बोलता ही नहीं...!

कहना की वो बिलकुल नहीं डरा और मुझे छोड़ कर नहीं भागा...
लड़ लड़ के मरा है हमारा बेटा फौजी था न के अभागा...!

हाँ लोगो तुम भी मुझे शहीद ही बुलाना...
इस माँ की खातिर मंज़ूर है पड़े जो हर इक माँ को रुलाना...!
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