गुरुवार, 1 सितंबर 2011

पता ही न चला


कब तुमने मेरा हाथ थामा
पता ही न चला
कब तुम मेरे अज़ीज बन गये
पता ही न चला

आहिस्ता से रगों में बहते लहु की तरह
कब धड़कनों में उतर गये
पता ही न चला

बचपन की गलियों से गुजरते हुए
यौवन की दहलीज़ तक
कब दोस्ती के रिश्ते गहराते चले गए
पता ही न चला

आज जब तुम दूर हो तो
इस गहराई की हुई है भनक
हर रिश्ते की खुशबू से
आती है बस तेरी दोस्ती की ही महक

कब तेरा साथ छूटा
पता ही न चला
कब तू मुझसे रूठा
पता ही न चला

आ..एक बार आजा,
देती हैं दोस्ती की वास्ता मेरी धड़कनें तुझे
ये दोस्ती अधूरी हूँ तेरे बिना,
आज यह एहसास है मुझे

भूल कर सब, ढूँढें एक मौका नया
आ फिर शुरु करें दोस्ती का सिलसिला
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