गुरुवार, 14 नवंबर 2013

फिर वही अकेलापन......

फिर वही .हाँ फिर वही 
सूनापन .

फिर वही सड़क पर आते-जाते 
लोगों को देखना एकटक.....

फिर वही घड़ी में बार-बार 
देखना समय......

फिर वही डोर बेल के 
बजने का इंतज़ार....

फिर वही मोबाइल पर 
चेक करना मिस्ड कॉल.......

फिर वही पलंग पर लेटे-लेटे 
पंखे को देखना.....

फिर वही फ़ेसबुक पर 
दोस्त ढूँढना .अपनी पोस्ट को 
कितनों ने लाइक किया, 
अधीर होकर गिनना.....

फिर वही जाने - अनजाने लोगों के 
ट्वीट्स में संवाद तलाशना.....

फिर वही टेबल लैंप का स्विच 
बार - बार ऑन करना 
ऑफ़ करना .सोचने के लिए 
कोई बात सोचना.....

फिर वही डेली सोप में 
मन लगाना .धारावाहिक के 
पात्रों में अपनापन खोजना .
उनकी कहानी में डूबना - उतरना,
उन्ही के बारे में अक्सर सोचना.....

फिर वही टीवी के 
चैनल बदलते रहना .
फिर वही सच्ची - झूठी 
उम्मीद बुनना......

फिर वही हर बीती बात की 
जुगाली करना. फिर वही 
वक़्त की दस्तक सुन कर 
चौंकना......

फिर वही दिन - रात को 
खालीपन के धागे से सीना.....

फिर वही बेचैनी,
अनमनापन.....

फिर वही 
अकेलापन .

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