शनिवार, 3 नवंबर 2012

चूल्हे की आग................



क्या वो बचपन के दिन थे 
जब हम अपने घर के बहार खेला करते थे......... 
और  शाम होते ही अडोस पड़ोस
की औरतें एक दुसरे के घर से 
आग मांग कर अपने घर की 
चूल्हा जलाया करती थी............

मिटटी का चूल्हा में गोबर की 
उपली और लकड़ी जला करती थी......
क्या बताऊँ वही राख,
खाद का काम किया करती थी.........

वो स्वाद वो देशी अंदाज 
अब हमेशा ही याद आता है.......
इस भाग दौड़ की शहरी जिंदगी में
लिट्टी चोखा भी हमको तरसता है........

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