बुधवार, 14 नवंबर 2012

मैं आम आदमी हूं..........


मेरे लिए हर खास आदमी चिंतित है........
पर मेरी चिंता उसे और खास बना देती है.........
मैं वहीं का वहीं रह जाता हूं.........
क्योंकि मैं आम आदमी हूं...........

सारी योजनाओं का केंद्र मैं हूं...........
पर योजनाओं के आम का पेड़.........
जब फल देने लगता है........
तब उसका स्वाद खास चखता है.......
मेरा मुंह खुला का खुला ही रह जाता है.......
क्योंकि मैं आम आदमी हूं..........

आम और खास का अंतर मिटाने की कवायदें जारी हैं.........
पर इन पर नीयत भारी है...........
ये दिखाती हैं, वो लकदक गलियां, जो भ्रष्टाचारी हैं.........
पर, मेरी आत्मा मुझे इनसे गुजरने की इजाजत नहीं देती.....
इसलिए कि मैं आम आदमी हूं.............
(सुरेश माहेश्वरी शिवम्‌)

शनिवार, 3 नवंबर 2012

चूल्हे की आग................



क्या वो बचपन के दिन थे 
जब हम अपने घर के बहार खेला करते थे......... 
और  शाम होते ही अडोस पड़ोस
की औरतें एक दुसरे के घर से 
आग मांग कर अपने घर की 
चूल्हा जलाया करती थी............

मिटटी का चूल्हा में गोबर की 
उपली और लकड़ी जला करती थी......
क्या बताऊँ वही राख,
खाद का काम किया करती थी.........

वो स्वाद वो देशी अंदाज 
अब हमेशा ही याद आता है.......
इस भाग दौड़ की शहरी जिंदगी में
लिट्टी चोखा भी हमको तरसता है........

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

दोस्त और दोस्ती............

दोस्त और दोस्ती एक दिन के लिये तो नही होती ना!
बल्कि हमेशा के लिये होती है तो आज कुछ
पन्क्तियां दोस्त और दोस्ती के लिये…

 ” उलझन मे हूं, या दुख मे मै,
दोस्त है मेरा, फ़िक्र करेगा!
 दूर है फ़िर भी भूलेगा ना,
कभी तो मेरा जिक्र करेगा!
दुनिया में कहीं भी होता हो मगर,
दोस्त का घर दूर कहाँ होता है!
जब भी चाहूँ आवाज लगा लेता हूँ,
वो मेरे दिल मे छुपा होता है!
जाने कैसे वो दर्द मेरा जान लेता है,
दुखों पे मेरे वो भी कहीं रोता है!
“यूं तो कहने को परिवार, रिश्तेदार साथ हैं,
जिन्दगी बिताने को, फ़िर भी एक दोस्त चाहिये,
दिल की कहने- सुनने, बतियाने को!!
 हर कोई ऐसा एक मित्र पाए, जो बातें सुनते थके नही,
और मौन को भी जो पढ जाए!!
 पुराने दोस्त और दोस्ती हमारे पुराने गांव की तरह होते हैं..
बरसों बाद जब हम फ़िर उनसे मिलते हैं तो कुछ बदल जाते हैं,
लेकिन बहुत कुछ पहले की तरह ही होते हैं..
 और अब कुछ पन्क्तियां और, जो किसी मित्र से ही कही जा सकती है.:)
किसी बात पर मैने अपने मित्र से कहा था…. ”
आत्म ज्ञान से इतना भी तृप्त मत हो जाइये कि और
कुछ जानने कि ख्वाहिश ही न रहे,
गर्व से इतना भी मत बिगड़ जाईये कि सुधार की गुंजाइश ही न रहे!!
 ज्ञानी होने ( दिखने) के चक्कर मे जमाना tense बहुत है,
हम तो कहेंगे, सबसे उपर रहने के लिये common sense बहुत है!!
 किसी की बात समझ न सको तो इतना न बौखलाइये!
बेहतर है आप अपनी समझ को समझाइये!! “

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

दिशाशुल विचार.........


दिशाशूल क्या होता है ? क्यों बड़े बुजुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक टोक करते हैं ? आज की युवा पीढ़ी भले हि उन्हें आउटडेटेड कहे ..लेकिन बड़े सदा बड़े ही रहते हैं ..इसलिए आदर करे उनकी बातों का ;
दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है|
हम सबने पढ़ा है कि दिशाएं ४ होती हैं |

१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण

परन्तु जब हम उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं तो ज्ञात होता है कि वास्तव में
दिशाएँ दस होती हैं |
१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण
५) उत्तर - पूर्व
६) उत्तर - पश्चिम
७) दक्षिण – पूर्व
८) दक्षिण – पश्चिम
९) आकाश
१०) पाताल

हमारे सनातन धर्म के ग्रंथो में सदैव १० दिशाओं का ही वर्णन किया गया है,
जैसे हनुमान जी ने युद्ध इतनी आवाज की कि उनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाई
दी | हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं |

दसों दिशाओं को समझने के पश्चात अब हम बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की |
ज्योतिष शब्द “ज्योति” से बना है जिसका भावार्थ होता है “प्रकाश” |
वैदिक ज्योतिष में अत्यंत विस्तृत रूप में मनुष्य के जीवन की हर
परिस्तिथियों से सम्बन्धित विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य यदि इसको तनिक
भी समझले तो वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली बहुत सी समस्याओं से बच
सकता है और अपना जीवन सुखी बना सकता है |

दिशाशूल क्या होता है ? दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करना
चाहिए | हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है |

१) सोमवार और शुक्रवार को पूर्व
२) रविवार और शुक्रवार को पश्चिम
३) मंगलवार और बुधवार को उत्तर
४) गुरूवार को दक्षिण
५) सोमवार और गुरूवार को दक्षिण-पूर्व
६) रविवार और शुक्रवार को दक्षिण-पश्चिम
७) मंगलवार को उत्तर-पश्चिम
८) बुधवार और शनिवार को उत्तर-पूर्व

परन्तु यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशा
में दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है | परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य
हो ओर उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी पड़े, जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो यह
उपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए –

रविवार – दलिया और घी खाकर
सोमवार – दर्पण देख कर
मंगलवार – गुड़ खा कर
बुधवार – तिल, धनिया खा कर
गुरूवार – दही खा कर
शुक्रवार – जौ खा कर
शनिवार – अदरक अथवा उड़द की दाल खा कर

साधारणतया दिशाशूल का इतना विचार नहीं किया जाता परन्तु यदि व्यक्ति के
जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्ति
मार्ग में आने वाली बाधाओं से बच सकता है | आशा करते हैं कि आपके जीवन
में भी यह गायन उपयोगी सिद्ध होगा तथा आप इसका लाभ उठाकर अपने दैनिक जीवन
में सफलता प्राप्त करेंगे |

हिंदी की पाती......


मेरे नाम पर "हिंदी दिवस" जोर सोर से मनाया जाता है। मेरे प्रचार व प्रशार के लिए बड़े बड़े भाषण दिए जा रहे हैं। सरकारी कार्यालयों में कही हिंदी पखवाडा और कही हिंदी महिना मनाया जा रहा है। मै इससे काफी खुश हूँ........ लेकिन दुःख इस बात का है की मेरा हर दिन हिंदी दिवस की तरह क्यूँ नहीं होता ? आप को मेरी याद केवल एक ही दिन क्यों आती है? आप रोज मुझे याद क्यूँ नहीं करते? स्वतंत्रता प्राप्ति के ६४ वर्षो के पश्चात भी मै आप के दिन चर्या की हिस्सा क्यूँ नहीं बन पाई ?
क्या आप को याद है की आजादी के बाद आप ने ही मुझे देश की राष्ट्र भाषा बनने का गौरव प्रदान किया। पर आज मुझे अपने आस्तित्व को बाचने की चिंता सता रही है। लोगो ने अपने स्वार्थ शिद्धि के लिए मेरा तो उपयोग किया, लेकिन जब मुझे अपनाने की बात आई तब मुंह फेर लिया गया।

हिंदी भाषी फ़िल्में विचारों के अदन प्रदान का एक सशक्त माध्यम रही है, लेकिन मेरे ही माध्यम से लोकप्रियता हासिल करने वाले अभिनेता व अभिनेत्रियों को टीवी पर अपना साक्षात्कार अंग्रेजी में देते है तब मुझे दुःख होता है।

देश के राज नेताओं ने भी मेरा बहुत उपयोग किया, लेकिन मेरे आश्तित्व की रक्षा के लिए कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाये। ऐसा नहीं है की लोगो ने मेरा महत्वा को न समझा हो। विश्व के सर्वोच्च मंच पर ( अंतर्राष्ट्रीय संघ की बैठक) श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपना भाषण हिंदी में दे कर मुझे गौरवान्वित किया। क्या ये स्वर्णिम क्षण आप ने भुला दिया। इस लिए मै सभी को याद दिलाना चाहती हूँ की इतनी उपेक्षाओं के बावजूद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और समझी जाने वाली भाषा मै ही हूँ। सारे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा मै ही हूँ।

सारे अवरोधों के बावजूद विश्व में मेरा तीसरा स्थान बना हुवा है। अगर हमारी भारतीय संस्कृत को संमृद्ध बनाना है तो मुझे अपनाना ही होगा। तभी सही मायने में मैं देश की राष्ट्रभाषा बन पाऊँगी।

इन्ही आशाओं और अपेक्षाओं के साथ..........

आपकी अपनी "हिंदी"

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कैक्टस घर में ना लगायें..............


**वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में केक्टस का पेड़ न लगायें
**वास्तु शास्त्र के अनुसार घर ,दुकान ,फेक्टरी या व्यवसायिक परिसरों में केक्टस का पेड़ लगाने से मना किया जाता है
**केक्टस में कांटे होते हैं और कांटे वाले कोई भी पौधे घर के आसपास में नही होना चाहिए
**जिस घर में कांटे होंगे वहाँ पर रहने वाले लोग एक दुसरे को चुभने वाली बात कहते रहेंगे
**केक्टस मूलतः रेगिस्थान में होता है इसका अर्थ है केक्टस ऐसे स्थान पर होता है जहाँ पर कुछ भी नही होता
**इसलिए केक्टस के पौधे को घर में लगाने से घर उजाड़ हो जायेगा ,घर को रेगिस्तान में बदलते देर नही लगेगी
**केक्टस के पौधे से दूध जैसा सफेद द्रव्य निकलता है और वास्तु शास्त्र में दूध वाले पौधे को लगाने से दोष होता है
**शायद इसी वजह से केक्टस को घर में लगाने से मना किया जाता है

जब तुम पौधा केक्टस का लगाओगे
तो जूही के फूलों की खुशबू
कहाँ से पाओगे..................
By Deonarayan Sharma Vastu Shastri

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

नारियल के प्रयोग.............


हिंदुत्व शंखनाद

जानिए की नारियल के प्रयोग द्वारा केसे करें अपनी सभी परेशानियों का निदान—-

जेसा की आप सभी जानते हें की नारियल एक ऐसी वस्तु है जो कि किसी भी सात्त्विक अनुष्ठान, सात्त्विक पूजा, धार्मिक कृत्यों तथा हरेक मांगलिक कार्यों के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण सामग्री है. इसकी कुछ विभिन्न विधियों द्वारा हम अपने पारिवारिक, दाम्पत्य तथा आर्थिक परेशानियों से निजात पा सकते हैं. ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार

—–घर में किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्या हो तो—-
एक नारियल पर चमेली का तेल मिले सिन्दूर से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें. कुछ भोग (लड्डू अथवा गुड़ चना) के साथ हनुमान जी के मन्दिर में जाकर उनके चरणों में अर्पित करके ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें. तत्काल लाभ प्राप्त होगा.

—यदि कुण्ड़ली में शनि, राहू, केतु की अशुभ दृष्टि, इसकी अशुभ दशा , शनि की ढ़ैया या साढ़े साती चल रही तो-
एक सूखे मेवे वाला नारियल लेकर उस पर मुँह के आकार का एक कट करें. उसमें पाँच रुपये का मेवा और पाँच रुपये की चीनी का बुरादा भर कर ढ़क्कन को बन्द कर दें. पास ही किसी किसी पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथ या सवा हाथ गढ्ढ़ा खोदकर उसमें नारियल को स्थापित कर दें. उसे मिट्टी से अच्छे से दबाकर घर चले जायें. ध्यान रखें कि पीछे मुड़कर नही देखना. सभी प्रकार के मानसिक तनाव से छुटकारा मिल जायेगा.

—-यदि आपके व्यापार में लगातार हानि हो रही हो, घाटा रुकने का नाम नही ले रहा हो तो -
गुरुवार के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में लपेटे. एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान के साथ आस-पास के किसी भी विष्णु मन्दिर में अपने संकल्प के साथ चढ़ा दें. तत्काल ही लाभ प्राप्त होगा. व्यापार चल निकलेगा.

यदि धन का संचय न हो पा रहा हो, परिवार आर्थिक दशा को लेकर चिन्तित हो तो-
शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मन्दिर में एक जटावाला नारियल, गुलाब, कमल पुष्प माला, सवा मीटर गुलाबी, सफ़ेद कपड़ा, सवा पाव चमेली, दही, सफ़ेद मिष्ठान एक जोड़ा जनेऊ के साथ माता को अर्पित करें. माँ की कपूर व देसी घी से आरती उतारें तथा श्रीकनकधारास्तोत्र का जाप करें. धन सम्बन्धी समस्या तत्काल समाप्त हो जायेगी.

—–शनि, राहू या केतु जनित कोई समस्या हो, कोई ऊपरी बाधा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, कोई अनजाना भय आपको भयभीत कर रहा हो अथवा ऐसा लग हो कि किसी ने आपके परिवार पर कुछ कर दिया है तो इसके निवारण के लिये-
शनिवार के दिन एक जलदार जटावाला नारियल लेकर उसे काले कपड़े में लपेटें. 100 ग्राम काले तिल, 100 ग्राम उड़द की दाल तथा एक कील के साथ उसे बहते जल में प्रवाहित करें. ऐसा करना बहुत ही लाभकारी होता है

.—–किसी भी प्रकार की बाधा, नजर दोष, किसी भी प्रकार का भयंकर ज्वर, गम्भीर से गम्भीर रोगों की समस्या विशेषकर रक्त सम्बन्धी हो तो-
शनिवार के दिन एक नारियल, लाल कपड़े में लपेटकर उसे अपने ऊपर सात बार उवारें. किसी भी हनुमान मन्दिर में ले जाकर उसे हनुमान जी के चरणों में अर्पित कर दें. इस प्रयोग से तत्काल लाभ होगा.

—-यदि राहू की कोई समस्या हो, तनाव बहुत अधिक रहता हो, क्रोध बहुत अधिक आ रहा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, परेशानियों के कारण नींद न आ रही हो तो-
बुधवार की रात्रि को एक नारियल को अपने पास रखकर सोयें. अगले दिन अर्थात् वीरवार की सुबह वह नारियल कुछ दक्षिणा के साथ गणेश जी के चरणों में अर्पित कर दें. मन्दिर में यथासम्भव 11 या 21 लगाकर दान कर कर दें. हर प्रकार का अमंगल, मंगल में बदल जायेगा

.—–यदि आप किसी गम्भीर आपत्ति में घिर गये हैं. आपको आगे बढ़ने का कोई रास्ता नही दिख रहा हो तो -
दो नारियल, एक चुनरी, कपूर, गूलर के पुष्प की माला से देवी दुर्गा का दुर्गा मंदिर में पूजन करें. एक नारियल चुनरी में लपेट कर (यथासम्भव दक्षिणा के साथ) माता के चरणों में अर्पित कर दें. माता की कपूर से आरती करें. ‘हुं फ़ट्’ बोलकर दूसरा नारियल फ़ोड़कर माता को बलि दें. सभी प्रकार के अनजाने भय तथा शत्रु बाधा से तत्काल लाभ होगा. —

शनिवार, 25 अगस्त 2012

" महाभारत " के ध्रितराष्ट्र...........

" महाभारत " के ध्रितराष्ट्र को कौन नहीं जानता ,
उसके अंधेपन को कौन नहीं जानता !
हम सभी ने महाभारत को कई बार पढ़ा है
उसकी कहानी को कईयों बार सुना है ,
साथ में ध्रितराष्ट्र के बारे में भी .........
कुछ की नजर में मजबूर और लाचार ,
शकुनी और दुर्योधन की शाजिश का शिकार .........
फिर भी इतिहास ध्रितराष्ट्र को ही दोषी मानता है !

खैर मुझे भी इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है !
बात हम अंधेपन की कर रहे हैं ........
उस अंधेपन की जो आँख होते हुए भी आँखें बंद कर बैठे हैं !
अभी हाल ही में हमने और पूरे देश ने आसाम मुंबई और
लखनऊ में हुए दंगे और " ईमान " वालों का बहशीपन को देखा है ,
और देखा वहां उपस्थित अंधे -बहरे , हाड - मांस के बने पुतलों ने
जिन्हें हम शायद इंसान कहते हैं , या कहते हुए भी शर्म आती है !
हाड-मांस के बने पुतलों में इंसान अब शायद ही बचे हों ........

इस तरह की घटनाओं ने एक बार फिर ये साबित कर
दिया कि हम ध्रतराष्ट्र की तरह अंधे हो चुके हैं जो सही
और गलत में अंतर नहीं कर पाते ,
सब कुछ हमारी आँखों के सामने हो जाता और
हम कुछ भी नहीं कर पाते .... शायद करना चाहते हों पर
हमारा जमीर तो मर चुका है ....शायद हम लकवाग्रस्त
शरीर और मन में हिम्मत ना जुटा पाए हों ......
कुछ भी हो पर सच तो ये है कि हम अंधे और बहरों
की तरह इस देश में जी रहे हैं ! क्या सही है क्या गलत है
सब जानते हैं फिर भी ......?

जब हम अपने साथ हुए
गलत का ही विरोध नहीं कर पाते ... जब हम अपने घर और
अपने आसपास होने वाली गलत बातों का ही विरोध नहीं
कर पाते तो ये समाज और देश में होने वाले गलत काम
और बुराई का विरोध कैसे कर पायेंगे ,
जब विरोध ही नहीं करेंगे तो खत्म कैसे करेंगे ........
शायद हमें सिर्फ और सिर्फ अपने आप से ही मतलब है
और हमें इसके अलावा कुछ भी नजर नहीं आता है .....
जब कभी हम पर कुछ घटित होता है या हम ऐसी किसी
घटना का शिकार होते हैं तब शायद हमारा अंधापन दूर होता है !
ये देश अब एक जंगल बन गया है जहाँ शेर कम इंसान की खाल
पहने भेड़िये ज्यादा हो गए हैं !

सब कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है ,
हमारी आँखों के सामने देश के दुश्मन देश को लूट रहे हैं और हम ........
हमारे अपने ही हमारे संस्कारों को मिटटी में मिला रहे हैं और हम ..............
हम भ्रष्ट राजनेताओं की गन्दी राजनीति का शिकार होकर अपनों की ही छाती में खंजर घोंप रहे है और हम .........
हम औरतों और बच्चों पर होते निर्मम अत्याचार को होते देख रहे हैं फिर भी हम ........
गरीब जनता की मेहनत और हक का पैसा भ्रष्ट अधिकारीयों और सफेदपोश नेताओं की तिजोरियों में जमा हो रहा है और हम ..........
हम जानबूझकर हर गलत और बुरे का साथ दे रहे हैं क्यों ? ..........
क्योकि अंधापन और बहरापन हमें विरासत में मिला है और विरासत में मिली हुई चीज बहुत लम्बे समय तक हमारे साथ चलती है !

ध्रितराष्ट्र से विरासत में मिले इस अंधेपन को मिटा दो और अपनी आँखें खोलो और देखो , ये दुनिया अब बदलाव चाहती है ............

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

फिर तिरंगा लहराने चले.......


फिर आज चले लहराने तुम , लालकिले पर वही तिरंगा ।
जिसकी कसमें खाकर जाने , कितने क्रांति के बीज उगे ।
जिसकी छवि आँखों में रखकर , बेंत चंद्रशेखर ने खाए ।
जिसकी खातिर असेम्बली में , भगतसिंह बटुकेश्वर ने पर्चे लहराए ।
जिसकी खातिर बिस्मिल ने , काकोरी में लूटा था ट्रेन ।
जिसकी खातिर असफाक ने , दे दी यौवन की क़ुरबानी ।

जिसकी खातिर भेष बदल कर , जीने को विवश सुभाष हुए ।
जिसकी खातिर सर्वस लुटाकर, गोली अपनों की खायी थी ।
बोलो क्या अब तक हम कर पाये , पूरे उनके सपनो को ???
या फिर पाल कर भ्रम को केवल , जीते रहे हम सपनों को ???
है भले देश में अपनी सत्ता , लेकिन हम क्या कर पाये है ?
भूँख , अशिक्षा, बेरोजगारी,बीमारी का, क्या हम हल दे पाये है ?

लुटी जाती अस्मत अब भी , अब भी जलती बहुएं है ।
भींख मांगता बचपन है , और वही अपाहिज बुढ़ापा है ।
सौतेली है अब भी वो भाषा , जो राष्ट्र भाषा कहलाती है ।
सत्ता के चारो खम्भों पर , भारत मां रोती जाती हैं ।
लूट घसोट मची है हर दिन, भ्रस्टाचार में सब कोई रंगा।
फिर भी देखो फहराने चले, लाल किले पर आज तिरंगा ।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

बरसो रे मेघा बरसो......

सुख गये कुए , सुख गये तालाब
नहरों में पानी नही रहा
वाटर सप्लाई हुई बंद
पशु प्यासे , पक्षी प्यासे
प्यासा है दो हाथ , दो पैरो वाला इंसान
होठो पर आ रही पापड़ी
तन पसीने से तरबतर
सुखी है धरती सारी , कर रही त्राहिमाम
उस मजदूर पर रहम करो
जिसका होता सूरज से रोज टकराव
उस किसान पर रहम करो जो बैठा फसल की आस में
रहम करो उस व्यापारी पर
जो बैठा सुबह से शाम ग्राहक की आस में
बरसो इंद्र देवता, रहम करो अब आप
धरती कर रही त्राहिमाम और धरती पर रहने वाले भी कर रहे त्राहिमाम
बरसो इंद्र , हे बरसो इंद्र , अब तो बरसो इंद्र
इतना बरसो की गड्ढो में पानी भर जाए
नहरों में पानी आ जाए
तालाब पानी से लबालब हो
किसान खुशहाल हो
सबको मिले इस गर्मी से राहत
अब तो बरसो इंद्र , हे इंद्र अब तो बरसो

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