गुरुवार, 17 मई 2012

चल पड़े मेरे कदम............

चल पड़े मेरे कदम, जिंदगी की राह में,
दूर है मंजिल अभी, और फासले है नापने..........
जिंदगी है बादलों सी, कब किस तरफ मुड जाय वो,
बनकर घटा घनघोर सी, कब कहाँ बरस जाय वो...............
क्या पता उस राह में, हमराह होगा कौन मेरा,
ये तो  इश्वर ही जानता, या जानता जो साथ होगा.............

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

मुझको नही दिलचस्पी............

मुझको नही दिलचस्पी
बिन लादेन को किसने मरा
मेरी दिलचस्पी बस इसमें हें
उसका घोसला कहाँ मिला

आंखे खोलने की जब भी हमने
की सच्ची कोशिश
दरकिनार कर हमारी कोशिश
सबकी आँखों पर पर्दा डाला

भारत मे जितने भी हुए आतंकी हमले
पैसा बस तुम्हारा ही था
अब क्यों दुनिया को नही बताते
कि किसके घर मे घुस कर उसको मारा

रविवार, 25 मार्च 2012

मत पूछो यारो.............

मत पूछो यारो हमसे क्या चीज जवानी है ।

छेड़ो तो नगमा है वर्ना खामोश कहानी है।

उम्र का ऐसा दौर है ये जब दिल बेकाबू होता है,

रोक सका न इसको कोई ये वो दरिया तूफानी है ।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

जिंदगी की तलाश.............


जिंदगी को जिंदगी की तलाश है,
इन आंखों में भी एक आस है।
कानों में भी कुछ सुनने की आस है,
हर किसी को किसी की तलाश है।
बुझते हुए दीये को रोशनी की तलाश है,
पतझड़ को सावन की प्यास है।
ज्येष्ठ के महीने को सावन से आस है,
जिंदगी को हमसे नहीं,
हमें जिंदगी से शिकायत है।
दगा करते हैं हमसे क्यों अपने,
जबकि हमें अपनों से ही आस है।
हमें खुशी की और खुशी को हमारी तलाश है,
जिंदगी को जिंदगी की तलाश है।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मुझे भी भ्रष्टाचार कर लेने दो..........


भाई साहब मैं मर जाऊंगा
मेरी धड़कनें रुक जायेंगी
सांस लेना मुश्किल हो जाएगा
मेरी बीवी घर से निकाल देगी
शान-सौकत सब चली जायेगी
किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूँगा
मुझे करने दो, थोड़ा-बहुत ही सही
पर मुझे भ्रष्टाचार कर लेने दो........$...........
.........
मैं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टाचारी हूँ
इरादतन भ्रष्टाचार का आदि हो गया हूँ
आज तक एक भी ऐसा काम नहीं किया
जिसमे भ्रष्टाचार न किया हो
लोग मेरे नाम की मिसालें देते हैं
मुझे जीने दो, मेरी हाय मत लो
मेरी हाय तुम्हें चैन से बैठने नहीं देगी
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ........$.........
.........
मेरी नस नस में भ्रष्टाचार दौड़ रहा है
दिल की धड़कनें भ्रष्टाचार से चल रही हैं
मान लो, मेरी बात मान लो
मुझे, सिर्फ मुझे, भ्रष्टाचार कर लेने दो
तुम हाय से बच जाओगे
और मेरी दुआएं भी मिलेंगी
यही मेरी पहली और अंतिम अर्जी है
क्यों, क्योंकि मैं एक ईमानदार भ्रष्टाचारी हूँ........$..........

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

गाँव मेरा मुझे याद आता है.............


भागता मैं रहा इस शहर से उस शहर ..............
पर कोई था ............................
जो मुझको बुलाता रहा.............
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा.............
एक प्यारा सा गाँव..
जिसमें पीपल की छाँव,
पेड़ जामुन के कुछ
खेत सरसों के कुछ
मीठा पानी कुँए का
मुझको बुलाता रहा .................
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा.............
धान की बालियाँ..............
महकी अमराइयाँ.............
माटी की सौंधी महक............$.............
बीता बचपन मुझे.............
बुलाता रहा ..................
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा..
माँ के आँचल का प्यार
दादी का दुलार................
वो सावन के झूले,
वो मीठी सी गुझिया
जिसमें कितना था लाड़...............
वो होली का फाग.................
रंग होली का मुझको बुलाता रहा .........
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा..............
गाँव मेरा मुझे बुलाता रहा.............
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा.............


हौसला बुलंद कर ले..............

रख हौसला खुद पे.................
यकीं एकबार कर ले.............
सामने तेरे खुला आकाश है..........
जीतने की कोशिश तू बस एकबार कर ले ...........

रास्तें की ठोकरें क्या रोक पाएंगी तुझे?
चल उठ! अपनी जीत का आगाज कर दे.............
स्वप्न जो आधे-अधूरे थे कभी...............
चल जाग जा तू नींद से...............
आज अपनी जीत का ऐलान कर दे,...............


है कंटीली राह तो क्या?
हार कर रुकना नही है तुझे...........
चल उठ!जीत का सेहरा तू अपने नाम कर ले..........

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

दिमाक और मन..........


नयी इच्छाओँ ने जन्म लेना
शुरू कर दिया है...
ये कैसे हो गया?
अभी तो कई पुरानी इच्छाएँ,
अपने साकार होने की
प्रतीक्षा कर रही हैँ...
अब इतनी सारी इच्छाएँ
कैसे पूरी होँगी?
दिमाग ने सोचने से
मना कर दिया है,
कह रहा है- "मन से जन्मी इच्छाएँ,
मैँ नहीँ सुलझाऊँगा.."
और मन कह रहा है-
"फिक्र मत करना और सबकुछ
परिस्थितियोँ पर छोड़ देना,
क्योँकि ये परिस्थितियाँ
या तो इच्छाएँ पूरी कर देँगी
या फिर स्वत: ही उन्हेँ दबा देँगी.."
अब सोच रहा हूँ कि
क्योँ ना अपनी नयी-पुरानी इच्छाओँ के साथ,
करूँ परिस्थितियोँ का इंतजार...
आखिर,
परिस्थितियोँ पर ही तो निर्भर है,
इन इच्छाओँ की परिणीती............

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

उतावला मन..........


मन बहुत उतावला होता है |

इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है |

चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी |

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आप भी मेरी इस कशमकश के साथी हैं,

साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया, विचार और राय के साथ् |

मेरे मन मे आज क्या है लिख दूँ पर हर पल न जाने किस ख्यालों में खोया रहता हूँ |





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सोमवार, 16 जनवरी 2012

जिंदगी का अनुभव.......सत्य......

ज़िन्दगी के राह से अक्सर गुजरते हुये मैने अपने अनुभव से बहुत सी बाते समझी है ऐसा मै मानता हुं अब ये कहा तक सही है या गलत है
ये तो सदियो से वक्त पर छोडते आये है, जैसे-जैसे बाते जहन मे आती है मै आपसे कहता रहूंगा क्योकि जब तक जहन से बाते बाहर न आ जाये तब तक एक बेखुदी सी छाई रहती है...............

अक्सर ये सवाल जहन मे आता है मै कौन हूं और कई बाते सोचने लगता है ये जहन, यदि ये मान कर चले कि मेरा नाम " श्याम " है तो ये मेरे शरीर का नाम है और उस शरीर से मै अपने आप को प्रस्तुत करता हूं मगर फ़िर एक बात जहन मे आती है कि शरीर भी अपना नही है ये पंचतत्व से बना है और उस मे विलीन हो जायेगा ऐसा शास्त्र मे लिखा है,,,, यहां पर ये बात आती है कि शरीर से मै प्रस्तुत होता हूं लेकिन शरीर मेरा नही है वो इन तत्वो से बना है और नाम देने से मजहब का पता चलता है इस लिये मै सिर्फ़ शरीर हुं और विचार मेरे है जो कि इस शरीर की संपत्ति है वही मेरी दौलत है क्योकि उसी
विचार के माध्यम से आप मुझे जानते है कि ये व्यक्ति " श्याम " है.
मेरा ये मानना है कि शरीर या किसी अस्तित्व को हम सिर्फ़ विचारो के आधार पर ही समझते है और उन्हे आधारो के माध्यम से नज़रिया तय होता है, यहां पर सोच और नज़र के दायरे पर ही इन्सान का व्यक्तित्व निर्भर करता है..................

अब इन सब बातो को जान लेने के बाद अक्सर मै जब नये-नये लोगो से मिलता हूं तो ये देखने की कोशिश करता हूं कि क्या ये आदमी उस स्तर से सोच सकता है अपने बारे और अपने परिवार के बारे मे या नही क्योकि हर व्यक्ति की सोच मे परिवेश का असर होता है कि वो किस प्रकार के माहौल मे पला-बढा है, और कितना धीरज के साथ सोचता है अक्सर लोग पहले से बनी हुई धारणाओ के आधार पर ही सोचते है अर्थात जरा गंभीरता से नही सोचते आनन-फ़ानन मे जो रास्ता पूर्व धारणा से निर्मित है उसी पर चलते आ रहे है एक परम्परा को ही दोहराते आ रहे है आखिर पहले के हालात और अब के हालात मे काफ़ी फ़र्क है तब की धारणाओ को अब अमल मे लाते रहना कितना सार्थक है यदि तब हालात समाज उतने उन्नतशील नही थे, मगर अब हम उतने उन्नतशील है मगर फ़िर भी हम आज के हालातो के अनुसार नही सोचना चाहते पता नही क्यो ?

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